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सनातन संस्था द्वारा प्रस्तुत पितृपक्ष विशेष लेख

 सनातन संस्था द्वारा प्रस्तुत पितृपक्ष विशेष लेख


श्राद्धकर्म की कुछ विधियों का अध्यात्मशास्त्र


श्री न्यूज़ 24/अदिति न्यूज़ 

संजय सिंह 


लखनऊ सनातन संस्था के संजय कुमार सिंह के अनुसार हिंदू धर्म में उल्लेखित ईश्वरप्राप्ति के मूलभूत सिद्धांतों में से एक सिद्धांत ‘देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण एवं समाजऋण, इन चार ऋणों को चुकाना है । इनमें से पितृऋण चुकाने के लिए पितृपक्ष में ‘श्राद्ध’ करना आवश्यक है । माता-पिता तथा अन्य निकटवर्ती संबंधियों की मृत्योपरांत, आगे की यात्रा सुखमय एवं क्लेशरहित हो तथा उन्हें सद्गति प्राप्त हो, इस उद्देश्य से किया जानेवाला संस्कार है ‘श्राद्ध’ । पितृपक्ष में श्राद्धविधि करने से अतृप्त पितरों के कष्ट से मुक्ति होने से हमारा जीवन भी सुखमय होता है । श्राद्ध की विभिन्न विधियों का अध्यात्मशास्त्र हम इस लेख के माध्यम से जानेंगे। इससे श्राद्ध जैसे धार्मिक कर्म का महत्व और श्रेष्ठता समझ में आएगा।

अध्यात्मशास्त्रीय विश्लेषण 

श्राद्धविधि में सोना अथवा चाँदी से बनी वस्तुएँ उपयोग की जा सकती हैं। परंतु आज के समय में सामान्य मनुष्य के लिए सोने के उपकरणों का प्रयोग व्यावहारिक दृष्टि से संभव नहीं होता, इसलिए यहाँ मुख्य रूप से चाँदी से संबंधित शास्त्र का उल्लेख किया गया है।)

श्राद्ध में रंगोली क्यों नही बनानी चाहिए ?

रंगोली बनाना शुभकर्म का प्रतीक माना जाता है, जिससे देवताओं की सात्त्विक तरंगों का स्वागत होता है। परंतु पितृकर्म के समय वातावरण में रज-तम प्रधान तरंगें सक्रिय होती हैं। इसलिए श्राद्ध में रंगोली बनाना वर्जित है।

भस्म से रंगोली बनाने पर उससे निकलने वाली तेजतत्त्व प्रधान तरंगें पितरों को अर्पित किये जाने वाले हविर्भाग (अन्न/पदार्थ) का नकारात्मक शक्तियों से रक्षण करती हैं और उन्हें शीघ्र संतुष्टि प्राप्त होती है। इसलिए श्राद्ध में भस्म से रंगोली बनाई जा सकती है ।

श्राद्ध में देवस्थानी ब्राह्मण पूर्वाभिमुख और पितृस्थानी ब्राह्मण उत्तराभिमुख क्यों बैठते हैं ? पूर्व-पश्चिम दिशा में क्रिया तरंगें (ज्ञान, इच्छा और क्रिया तरंगें) अधिक घनीभूत होती हैं। मंत्रोच्चार से वे शीघ्र गति प्राप्त करती हैं, इसलिए देवस्थानी ब्राह्मण पूर्व की ओर मुख करके बैठते हैं।

पितरों के आगमन के लिए यमतरंगें उत्तर-दक्षिण दिशा में अधिक सक्रिय रहती हैं। इसलिए पितृस्थानी ब्राह्मण उत्तराभिमुख बैठते हैं।

श्राद्धविधि से होने वाले लाभ

(अ) यजमान को लाभ : ब्राह्मणों के माध्यम से देवता और पितर संतुष्ट होकर यजमान को आशीर्वाद देते हैं। पितृदोष का प्रभाव घटता है तथा परिवार को भी लाभ होता है। तथा पितरों को आगे की गति मिलती है।

(आ) ब्राह्मणों को लाभ : श्राद्ध में दो प्रकार के ब्राह्मण होते हैं – देव-ब्राह्मण और पितृ-ब्राह्मण। देव-ब्राह्मण को सात्त्विक ऊर्जा प्राप्त होती है और उनके माध्यम से देवता भी अन्न ग्रहण करते हैं। पितृ-ब्राह्मण को दिया गया दान शीघ्र फलित होता है।

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