जांच आख्या में नाम बदलने पर थाना जगदीशपुर की कार्रवाई पर गंभीर सवाल
जांच आख्या में नाम बदलने पर थाना जगदीशपुर की कार्रवाई पर गंभीर सवाल
श्री न्यूज़ 24/अदिति न्यूज़
संजय सिंह
अमेठी/जगदीशपुर थाना जगदीशपुर में फेसबुक की कथित फर्जी आईडी से मानहानि करने की शिकायत की जांच में पुलिस की अलग-अलग जांच आख्या में गवाहों के नाम बदलने का आरोप सामने आया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि लखनऊ स्थित सचिवालय में सहायक समीक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत विनोद तिवारी को इस मामले में गवाह के रूप में कैसे और किस आधार पर शामिल किया गया। शिकायतकर्ता गंगेश पाठक ने पूछा है कि जब विनोद तिवारी सरकारी सेवा में लखनऊ में पदस्थ हैं, तो वे बार-बार गांव मंगौली से जुड़े मामलों में गवाह कैसे बनते रहे। क्या थाना पुलिस उनसे पूछकर कार्रवाई करती है, यह भी जांच का विषय बनना चाहिए।
शिकायतकर्ता के अनुसार, 30 अगस्त 2025 की जांच आख्या में पुलिस ने गांव जाकर अतुल तिवारी और विनोद तिवारी से संपर्क कर उनके बयान दर्ज करने की बात लिखी है। इसी आख्या में आईजीआरएस संदर्भ संख्या 40020325027766, 028066, 028051 और 028294 दर्ज हैं। इसके बाद 28 मई 2026 को अज्ञात के विरुद्ध मु0अ0सं0 158/2026, धारा 352, 351(2) बीएनएस एवं 66 आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ।
एफआईआर के अगले दिन 29 मई 2026 की जांच आख्या में अतुल तिवारी का नाम नहीं है, जबकि विनोद तिवारी का नाम दर्ज है।
9 जून 2026 की आख्या में भी केवल विनोद तिवारी का नाम है। तीनों आख्या में निरीक्षक राघवेंद्र प्रताप यादव, थाना जगदीशपुर, को जांच अधिकारी बताया गया है।
गंगेश पाठक ने सवाल उठाया है कि विनोद तिवारी को पहली आख्या में गवाह बनाने का आधार क्या था।
उनका बयान कब, कहां और किस पुलिस अधिकारी ने दर्ज किया। क्या उनके बयान का शिकायत में उपलब्ध फेसबुक स्क्रीनशॉट, लिंक और अन्य डिजिटल साक्ष्यों से मिलान किया गया। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि अतुल तिवारी का नाम बाद की आख्या से क्यों हटा, जबकि विनोद तिवारी का नाम लगातार बना रहा।
क्या इसके लिए कोई नया बयान लिया गया, कोई स्वतंत्र साक्ष्य मिला या केस डायरी व जीडी में इसका कारण दर्ज किया गया।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि विनोद तिवारी लखनऊ स्थित सचिवालय में सहायक समीक्षा अधिकारी हैं। उनका सवाल है कि सरकारी नौकरी में लखनऊ में रहते हुए वे गांव मंगौली से जुड़े मामलों में बार-बार गवाह कैसे बनते रहे।
क्या थाना पुलिस उनसे फोन पर जानकारी या राय लेती थी। क्या रविवार या अवकाश के दिन गांव आने पर थाना पुलिस उनसे संपर्क करती थी। क्या उनके बताए तथ्यों के आधार पर कोई रिपोर्ट या कार्रवाई तय होती थी। गंगेश पाठक ने कहा कि ये सवाल केस डायरी, जीडी, दर्ज बयानों और संबंधित पुलिस अभिलेखों से ही स्पष्ट होंगे।
शिकायतकर्ता के अनुसार, 30 मई 2026 को “विनोद तिवारी” नाम की फेसबुक आईडी से जुड़े स्क्रीनशॉट, लिंक और अन्य डिजिटल साक्ष्य पुलिस को उपलब्ध कराए गए थे। शिकायत में ‘ग्राम पंचायत मंगौली’, ‘दूध का दूध पानी का पानी’, ‘ग्राम मंगौली’ और ‘कंगन चोर’ सहित कई फेसबुक आईडी का उल्लेख किया गया था। उनका कहना है कि मामले का असली मुद्दा इन आईडी की तकनीकी जांच कर वास्तविक संचालक की पहचान करना था।
गंगेश पाठक ने मांग की है कि अज्ञात आईडी और ‘विनोद तिवारी’ नाम की आईडी के बीच पोस्ट, कमेंट, लिंक, भाषा, शब्द चयन, वाक्य संरचना और लेखन शैली की वैज्ञानिक तुलना की जाए। उनका कहना है कि आरोप या अनुमान से नहीं, डिजिटल फोरेंसिक जांच और तकनीकी साक्ष्यों से ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
गंगेश पाठक ने आरोप लगाया है कि जब विनोद तिवारी से जुड़ी फेसबुक आईडी की जांच की मांग उठी, तब उनके भाई की ओर से दर्ज मुकदमा और दूसरी कार्रवाई सामने लाई गई। उनका सवाल है कि क्या इससे संबंधित आईडी की निष्पक्ष जांच से बचने का प्रयास हुआ। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
शिकायतकर्ता ने उच्चाधिकारियों से मांग की है कि 30 अगस्त 2025, 29 मई 2026 और 9 जून 2026 की जांच आख्या, मूल शिकायतें, आईजीआरएस अभिलेख, दर्ज बयान, केस डायरी, जीडी और साइबर जांच से जुड़े पत्राचार की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए। उनका कहना है कि केवल “विवेचना प्रचलित” लिखना पर्याप्त नहीं है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि विनोद तिवारी को कितनी बार गवाह बनाया गया, उनकी गवाही का आधार क्या था और क्या थाना पुलिस उनके कहने पर कार्रवाई करती थी।
यदि स्थानीय स्तर की जांच की निष्पक्षता पर संदेह है, तो शिकायतकर्ता ने अमेठी जिले से बाहर के किसी अन्य जिले अथवा स्वतंत्र सक्षम विभाग की टीम से जांच कराने की मांग भी की है। उनका कहना है कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच से ही पूरे मामले की सच्चाई सामने आएगी और पुलिस प्रशासन पर जनता का भरोसा बना रहेगा।

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