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बेहड़ा बाबा मे पंच दिवसीय गंगा दशहरा मेले का 25 से होगा भव्य शुभारम्भ

बेहड़ा बाबा मे पंच दिवसीय गंगा दशहरा मेले का 25 से होगा भव्य शुभारम्भ 



श्री न्यूज़ 24/अदिति न्यूज़ 

राजू सिंह 

पलिया कलां खीरी।


नेपाल के धनगड़ी स्थित सुप्रसिद्ध बेहड़ा बाबा  जहाँ प्राचीन समय से लगने वाले गंगा दशहरा मेले का 25 पचीस मई से होगा भव्य शुभारम्भ जिसको लेकर बेहड़ा बाबा प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष खेम बहादुर एवं महंत पूर्णा नंद गिरी ने बताया कि भारत नेपाल से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने खाने एवं सुरक्षा के उचित प्रबन्ध के साथ भारत के विभिन्न प्रांतों से बस व रेल यातायात के माध्यम से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क नगर बस सेवा का भी उचित प्रबन्ध रहेगा इसी के साथ विभिन्न आश्रम मठ मंदिरों से आने वाले साधु संतों के जप तप के लिए समिधा सामग्री का निशुल्क प्रबन्ध भी रहेगा ।

इसी के साथ मेले मे संगीतमयी कथा हवन पूजन के साथ मेले मे प्रसाद खाने पीने की वस्तुओं की दुकाने एवं बच्चों के लिए आकर्षक झूले आदि भी रहेंगे जो श्रद्धालु जन अपने निजी वाहनों के माध्यम से आएंगे उनके लिए पार्किंग आदि की भी निशुल्क व्यवस्था की गयी है।

किवदतियों के अनुसार बेहड़ा बाबा का इतिहास एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी शिवलिंग की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है। यह पवित्र धार्मिक स्थल नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रांत के कैलाली जिले में, धनगढ़ी उपमहानगरपालिका के उरमारमपुर (रामपुर) गांव के घने जंगलों के बीच स्थित है।

बेहड़ा बाबा मंदिर का इतिहास और पौराणिक मान्यताएं इस प्रकार हैं।

1. पौराणिक कथा और शालिग्राम की कथामान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में एक महात्मा (सिद्ध पुरुष) भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करके एक अत्यंत पवित्र शालिग्राम और शिवलिंग लेकर लौट रहे थे। भगवान शिव ने उन्हें सख्त हिदायत दी थी कि गंतव्य तक पहुँचने से पहले वे इस शिवलिंग या शालिग्राम को कभी भी जमीन पर न रखें।मार्ग में इस घने जंगल से गुजरते समय महात्मा को लघुशंका (urinate) की तीव्र इच्छा हुई। नियम के कारण उन्होंने वहां घूम रहे एक चरवाहे बालक (बटुवे) को वह सामग्री थोड़ी देर पकड़ने के लिए दे दी। महात्मा ने बालक को यह नहीं बताया कि इसे जमीन पर नहीं रखना है। भारी वजन होने के कारण बालक ने उसे वहीं जमीन पर रख दिया। जब महात्मा लौट कर आए, तो वह शिवलिंग और शालिग्राम जमीन में धंस चुके थे और लाख कोशिशों के बाद भी उन्हें उठाया नहीं जा सका।2. शिवलिंग की खोज (चरवाहों की कथा)समय बीतने के साथ वह स्थान पूरी तरह घने जंगल में तब्दील हो गया। सालों बाद, स्थानीय चरवाहों ने देखा कि उनकी गायें और भैंसें जंगल के एक विशेष स्थान पर जाकर स्वयं अपना दूध बहाने लगती थीं। जब ग्रामीणों ने कौतूहलवश उस स्थान पर खुदाई की, तो वहां से एक दिव्य शिवलिंग प्रकट हुआ। इसी घटना के बाद से वहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना शुरू हो गई।3. आक्रांताओं के असफल प्रयास का इतिहासस्थानीय दंतकथाओं के अनुसार, मध्यकाल में जब इस क्षेत्र में बाहरी उपद्रवियों या डाकुओं का दबदबा बढ़ा, तो उन्होंने इस दिव्य शिवलिंग को उखाड़कर अपने साथ ले जाने का प्रयास किया। उन्होंने शिवलिंग को रस्सियों से बांधकर खींचने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे। गुस्से में आकर उन्होंने लोहे के घन (हथौड़े) से शिवलिंग पर प्रहार कर दिया। कहा जाता है कि उस प्रहार के निशान आज भी बेहड़ा बाबा के शिवलिंग के ऊपरी हिस्से पर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।4. मंदिर का आधुनिक निर्माण और थारू जनजाति का जुड़ावआधुनिक मंदिर: वर्तमान मंदिर के ढांचे का निर्माण वर्ष 1982 में बालचंद, तुलसी मुखिया और लाडेपुजारी जैसे स्थानीय भक्तों के सहयोग से कराया गया था।थारू समुदाय की आस्था: तराई क्षेत्र में रहने वाली पारंपरिक थारू जनजाति के लोग बेहड़ा बाबा को अपना कुलदेवता या रक्षक मानते हैं।

 महादेवा तालाब मंदिर परिसर के पास ही महादेवा नाम का एक विशाल और पवित्र तालाब स्थित है, जहां भक्त पूजा करने से पहले स्नान करते हैं।प्रमुख उत्सव और महत्व बेहड़ा बाबा मंदिर को भारत और नेपाल की धार्मिक एकता का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। हर साल महाशिवरात्रि और गंगा दशहरा के पावन अवसर पर यहां 5 दिनों का एक बहुत बड़ा भव्य मेला लगता है, जिसमें उत्तर प्रदेश (भारत) और नेपाल के लाखों श्रद्धालु जल चढ़ाने आते हैं। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है।

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