अशोक सिंघल का पूरा जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित था : नरेन्द्र मोदी
अशोक सिंघल का पूरा जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित था : नरेन्द्र मोदी
श्री न्यूज़ 24/अदिति न्यूज़
संजय सिंह
युगपुरुष अशोक सिंहल के जन्मशताब्दी वर्ष पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लेख
एक बहुत सुंदर सुभाषित है वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।” इसका मतलब है कि पेड़ कभी अपने फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल अपने पास नहीं रखती। इसी तरह, संत स्वभाव के लोग भी स्वयं को प्राथमिकता ना देते हुए, सदैव दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं, अपना जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं। सदियों से हमारे ऋषियों ने हमें यही सिखाया है कि मानवता के कल्याण के लिए समर्पित जीवन का महत्व व्यक्तिगत उपलब्धियों से कहीं अधिक होता है। श्रद्धेय अशोक सिंघल का जीवन इस भावना का पुण्य उदाहरण है।
27 सितंबर से हम स्वर्गीय अशोक सिंघल का जन्म-शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं। यह एक महान विभूति के सम्मान का सुअवसर है। उन्होंने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और दशकों तक समर्पित भाव से समाज एवं संगठन के कार्यों को आगे बढ़ाया।
यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मुझे स्वर्गीय अशोक के साथ लंबे समय तक कार्य करने, उनसे सीखने, उनसे संवाद करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला। मुझे 1981 का एक प्रसंग याद आता है। उस समय मैं एक युवा कार्यकर्ता के तौर पर संगठन की ओर से मिली जिम्मेदारियां निभा रहा था। तब मुझे अशोक का हाथ से लिखा एक पत्र मिला। उन्होंने पत्र में आने वाले एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी थी और मुझे कुछ जिम्मेदारियां सौंपी थीं। उस समय अशोक सिंघल से पत्र पाना, मेरे लिए बहुत विशेष और यादगार क्षण बन गया था।
राम जन्मभूमि आंदोलन में अशोक सिंघल की ऐतिहासिक भूमिका का स्मरण किए बिना उनका कोई भी उल्लेख अधूरा है। वर्ष 1991 की बोट क्लब रैली में दिए गए उनके ओजस्वी संबोधन को कौन भूल सकता है? या आंदोलन के चरम पर लहूलुहान और घायल अवस्था में अशोक की वह ऐतिहासिक तस्वीर भला किसकी स्मृति से मिट सकती है? आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर है, तो इसके पीछे अशोक जी जैसी विभूतियों का निस्वार्थ समर्पण है
राष्ट्र-निर्माण के साथ ही अशोक सिंघल के दो ऐसे प्रिय क्षेत्र थे, जो उनके हृदय के अत्यंत निकट थे। शिक्षा (विशेषकर वैदिक शिक्षा) और संगीत, इन दोनों से उनका गहरा लगाव था। वाराणसी के सांसद के रूप में मुझे इस बात पर अत्यंत गर्व की अनुभूति होती है कि जहां का मैं प्रतिनिधित्व करता हूं, उस शाश्वत काशी ने अशोक सिंघल के जीवन में एक अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बीएचयू से शिक्षा प्राप्त की थी और वे एक मेधावी छात्र के रूप में जाने जाते थे। वे एकल विद्यालय की पहल से भी गहराई से जुड़े थे, जिसने दूर-दराज के गांवों, खासकर जनजातीय समुदायों तक बुनियादी शिक्षा पहुंचाने का कार्य किया। वे जितने गहरे अध्येता और उत्साही पाठक थे, उतने ही अच्छे श्रोता भी थे। वे युवा कार्यकर्ताओं को सदैव पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते थे।
अशोक को निकट से जानने वालों को पता है कि वे कितना सुंदर गाते थे। मुझे नागपुर की उन बैठकों की याद आती है, जिसमें वे 'एकल गीत' गाया करते थे। उनका गायन सभी को मंत्रमुग्ध कर देता था और पूरी बैठक में नई ऊर्जा भर जाती थी। वर्ष 2015 में उनके 90वें जन्मदिवस समारोह का एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने ‘हे मातृभूमि मेरी, हे पितृभूमि मेरी’ गाकर सभी को चौंका दिया था।
स्वर्गीय अशोक सिंघल ने अपने जीवन में हर क्षण इस महान राष्ट्र के उत्कर्ष का ही स्वप्न देखा था। उनके आदर्शों से आज भी हमें ये प्रेरणा मिलती है। उनकी जन्मशती के इस पावन अवसर पर हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिक से अधिक युवा उनके विराट व्यक्तित्व और महानता से परिचित हों। आइए, हम अपने राष्ट्र और देशवासियों के लिए अशोक सिंघल के सपनों को साकार करने के संकल्प को एक बार फिर दोहराएं।

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