बंद लाइन बनी काल, खंभे पर ही बुझ गई घर के इकलौते कमाऊ बेटे की सांसें
बंद लाइन बनी काल, खंभे पर ही बुझ गई घर के इकलौते कमाऊ बेटे की सांसें
सुनील चौरसिया डिप्टी मंडल ब्यूरो
अयोध्या श्री न्यूज़ 24
अमेठी। रविवार का सूरज जंगल टिकरी के शिवकुमार के घर अंधेरा लेकर डूबा। जो बेटा सुबह रोटी का वादा कर निकला था, शाम को उसकी लाश घर लौटी। मुंशीगंज रोड के हाजी नगर में बिजली का तार जोड़ते-जोड़ते शिवकुमार ने अपनी जिंदगी का तार हमेशा के लिए तोड़ दिया।
पेट की मजबूरी उसे खंभे पर ले गई थी। संविदा पर था, पर जिम्मेदारी पूरी निभाता था। शटडाउन लिया, भरोसा किया कि अब लाइन मरेगी नहीं। पर जिस विभाग ने उसे शटडाउन का भरोसा दिया, उसी की लाइन ने पीठ में छुरा घोंप दिया। अचानक 11 हजार वोल्ट की मौत चीखती हुई आई और शिवकुमार को जकड़ लिया। एक पल में सब खत्म। न चीख पूरी हुई, न सांस। खंभे से लटकता शरीर जमीन पर आ गिरा।
साथियों ने दौड़कर सीने से लगाया। शिवा, आंख खोल' की आवाजें गूंजती रहीं। कांपते हाथों से उसे उठाकर सीएचसी की तरफ भागे। पर रास्ते में ही उसकी धड़कन साथ छोड़ गई। डॉक्टर ने गर्दन हिलाई और बोला 'खत्म'। साथियों के सब्र का बांध टूट गया। खून से सना उनका साथी अब मिट्टी होने वाला था।
गांव में खबर पहुंची तो मातम पसर गया। बूढ़ी मां दहाड़ मारकर गिरी। पत्नी का सिंदूर पोंछ गया। छोटे-छोटे बच्चे पिता की लाश से लिपटकर पूछ रहे थे, 'पापा उठो ना'। पर शिवकुमार अब कभी नहीं उठेगा। अस्पताल के बाहर जमीन पर लेटे परिजनों का कलेजा फटा जा रहा था। पोस्टमार्टम वाली गाड़ी के आगे लेटकर बस यही बिलख रहे थे, 'साहब मेरा बेटा लौटा दो. नहीं तो इंसाफ दे दो।'
आंसुओं के बीच एक सवाल सबसे भारी था, शटडाउन के बाद लाइन किसने चालू की? किसने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया? क्या संविदा कर्मी की जान इतनी सस्ती है?
आज उस घर का चूल्हा बुझ गया है। बच्चों की किताबें, बूढ़ी मां की दवा, पत्नी का भविष्य सब एक झटके में करंट खा गया। ड्यूटी पर शहीद हुए शिवकुमार की लाश तो पोस्टमार्टम को चली गई, पर उसके परिवार के जख्मों का पोस्टमार्टम कौन करेगा? विभाग के अफसर अब भी मुंह फेरे बैठे हैं।
दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों पर सख्त कार्यवाई को और, परिजन को एक नौकरी और परिवार के भरण पोषण के लिए उचित मुआवजा मिले,यही मेरी मांग है।
फिलहाल अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

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