विधायक का अहंकार बनाम सेवा की दस्तक,पारिजात लिखेंगी मछलीशहर का नया अध्याय?
विधायक का अहंकार बनाम सेवा की दस्तक,पारिजात लिखेंगी मछलीशहर का नया अध्याय?
जौनपुर।
मछलीशहर की मिट्टी इन दिनों केवल राजनीति नहीं, बल्कि स्वभावों का भी मुकाबला देख रही है—एक ओर सत्ता का अभिमान है, तो दूसरी ओर सेवा का संकल्प। समय जैसे ठहरकर देख रहा है कि जनता किसे चुनेगी—अहंकार की ऊँची मीनार को या विनम्रता की ठोस नींव को।
वर्तमान विधायक रागिनी सोनकर का राजनीतिक व्यवहार अब सवालों के घेरे में है। क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि उनका जनसंपर्क अब जमीन से अधिक मंचों और आयोजनों तक सीमित होता जा रहा है। जनता के बीच एक धारणा बनती दिख रही है—“नेतृत्व वह नहीं जो केवल दिखे, बल्कि वह है जो साथ खड़ा भी दिखे।”
लोगों की जुबान पर यह भी सुनाई देता है कि रागिनी का राजनीतिक व्यक्तित्व अब “रील” में अधिक और “रियल” में कम नजर आता है।
इसी बीच, एक नई दस्तक ने सियासत के इस शांत तालाब में हलचल पैदा कर दी है—पारिजात मयंक सोनकर। पेशे से सुप्रीम कोर्ट की वकील, पर स्वभाव से सहज और संवादप्रिय। उन्होंने अपने पहले ही सार्वजनिक कार्यक्रम—महिला सशक्तिकरण सम्मेलन—से यह संकेत दे दिया कि वह राजनीति को केवल पद नहीं, बल्कि दायित्व मानती हैं।
उनके शब्दों में एक सादगी है, जो सीधे दिल तक उतरती है—
"पहले जनता का दिल जीतना है, फिर चुनाव लड़ना है।"
यह कथन केवल एक बयान नहीं, बल्कि उस राजनीति का संकेत है, जिसमें सत्ता से पहले सेवा आती है।
पारिजात का दृष्टिकोण जातीय सीमाओं से परे दिखाई देता है। जहां एक ओर राजनीति अक्सर समीकरणों में उलझती है, वहीं वह “सबका साथ, सबका विकास” को अपने व्यवहार में उतारने की बात करती हैं। उनके कार्यक्रमों में बढ़ती भीड़ और लोगों का स्वाभाविक जुड़ाव इस बात का प्रमाण बनता जा रहा है कि जनता बदलाव की आहट को महसूस कर रही है।
दूसरी ओर, रागिनी सोनकर की सक्रियता अब एक प्रकार की राजनीतिक मजबूरी जैसी प्रतीत होती है—जैसे कोई किला अपनी दीवारें मजबूत करने में लगा हो, पर भीतर की दरारें छिपा न पा रहा हो।
निषाद जयंती जैसे आयोजनों में उनकी उपस्थिति को लोग एक रणनीतिक चाल के रूप में देख रहे हैं, न कि आत्मीय जुड़ाव के रूप में।
राजनीति के इस द्वंद्व को अगर एक पंक्ति में कहा जाए, तो यह वही पुरानी कहानी है—
“जहाँ अहंकार खड़ा होता है, वहीं से पतन की शुरुआत होती है; और जहाँ सेवा झुकती है, वहीं से जनसमर्थन उठ खड़ा होता है।”
मछलीशहर की जनता अब केवल वादों से नहीं, व्यवहार से निर्णय लेने के मूड में है। 2027 की राह अभी दूर है, पर संकेत साफ हैं—यह चुनाव केवल दो चेहरों का नहीं, दो विचारों का होगा।और अगर यही रफ्तार रही, तो संभव है कि आने वाले समय में मछलीशहर की सियासत एक नई इबारत लिखे—जहाँ रागिनी का अहंकार नहीं, सेवा का संस्कार विजयी हो।

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